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CJI बोले जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता का कोई सशर्त समर्पण नहीं हुआ

नई दिल्ली- सीजेआई ने कहा कि 1972 में जम्मू-कश्मीर के संबंध में अनुच्छेद 248 में संशोधन किया गया था। इसमें कहा गया था कि संसद के पास भारत की संप्रभुता को बाधित करने वाली गतिविधियों की रोकथाम पर कानून बनाने की विशेष शक्तियां हैं। इसलिए विलयपत्र के बाद संप्रभुता का कोई अवशेष बरकरार नहीं रखा गया। क्या यह सही है कि अनुच्छेद 248, जैसे था वैसे ही 5 अगस्त 2019 से ठीक पहले जम्मू-कश्मीर पर लागू था?

सीजेआई ने कहा जम्मू-कश्मीर के अलावा किसी दूसरे भारतीय राज्य का मामला देख लीजिए। राज्य सूची के विषयों के लिए किसी भी राज्य के लिए कानून बनाने की संसद की शक्तियो पर प्रतिबंध हैं। विधायी शक्तियों के बंटवारे से इस बात पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि संप्रभुता भारत में ही निहित है। कानून बनाने की शक्ति पर रोक संविधान की योजना या ढांचे में निहित है। क्योंकि हमारे यहां एकात्मक राज्य नहीं है, लेकिन क्या वह संप्रभुता से पीछे हट जाता है? उन्होंने कहा नहीं, यह संसद पर एक बंधन जैसा है।

संप्रभुता का हस्तांतरण पूरा हो चुका- सीजेआई

पसीजेआई ने कहा कि एक बार अनुच्छेद 1 कहता है कि भारत राज्यों का संघ होगा और इसमें जम्मू-कश्मीर राज्य भी शामिल है, संप्रभुता का हस्तांतरण पूरा हो गया था। हम अनुच्छेद 370 के बाद के संविधान को एक ऐसे दस्तावेज के रूप में नहीं पढ़ सकते हैं जो की जम्मू-कश्मीर में संप्रभुता के कुछ तत्वों को बरकरार रखता है। संविधान में ऐसे कई प्रावधान हैं जो राज्यों की सहमति से भी लागू होते हैं। अनुच्छेद 249 को ही देख लीजिए। सहमति केवल जम्मू-कश्मीर के साथ संबंधों के लिए अलग बात नहीं है। संविधान में विभिन्न प्रकार की सहमति की जरूरत भी होती है। इसका मतलब ये नही है कि वो संघ की संप्रभुता को प्रतिबिंबित नहीं करता।

सीजेआई ने अनुच्छेद 246ए का किया उल्लेख

सीजेआई ने कहा कि अनुच्छेद 246ए का उदाहरण देखिए – जब यह अनुच्छेद जीएसटी संशोधन के परिणामस्वरूप आया था। तो यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है जहां भारत सरकार या संसद राज्यों की सहमति के बिना कुछ नहीं कर सकती, लेकिन 246ए ने संप्रभुता की हमारी धारणाओं को पूरी तरह से फिर से परिभाषित किया है क्योंकि राज्यों को वित्तीय मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। सीजेआई ने कहा एक बात बहुत स्पष्ट है कि भारत के साथ जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता का कोई सशर्त समर्पण नहीं हुआ है। संप्रभुता का समर्पण बिल्कुल पूर्ण था। एक बार जब संप्रभुता पूरी तरह से भारत में निहित हो गई, तो कानून बनाने की संसद की शक्ति पर आ गई

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