सुप्रीम कोर्ट ने दी 28 हफ्ते की गर्भवती को गर्भपात की इजाजत,जानिए क्या है पूरा मामला

नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने रेप पीड़िता की गुहार सुनते हुए 27 सप्ताह से ज्यादा का गर्भ होने के बाद भी गर्भपात की अनुमति दे दी है। इस मामले में समय निकल जाने का हवाला देते हुए गुजरात हाई कोर्ट ने गर्भपात की मंजूरी देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद दुष्कर्म पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि शादी के बिना (रेप जैसी स्थिति में) गर्भधारण करना तनाव का कारण बन सकता है। इसलिए रेप पीड़िता को गर्भपात कराने की मंजूरी दी जाती है। पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट पर ध्यान देते हुए जस्टिस बी वी नागरत्ना और उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि गुजरात हाई कोर्ट का पीड़िता की अपील खारिज करना सही नहीं था।
कोर्ट से मिली अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय समाज में शादी के बाद गर्भावस्था किसी भी कपल, उसके परिवार और दोस्तों के लिए खुशी का कारण होती है। इसके उलट शादी के बिना (दुष्कर्म जैसे केस में) गर्भवास्था नुकसानदायक हो सकती है। खासतौर पर यौन उत्पीड़न या दुर्व्यवहार के मामलों में प्रैग्नेंसी महिलाओं के स्वास्थ्य और मन पर बुरा प्रभाव डाल सकती है। दुष्कर्म के बाद गर्भावस्था उस जख्म को और ज्यादा बढ़ा देती है। इसलिए पीड़िता को गर्भवास्था खत्म करने की अनुमति दी जाती है।
भ्रूण जीवित रहा तो सरकार
कोर्ट ने आगे कहा था कि पीड़िता को कल अस्पताल में मौजूद होना होगा। ताकि उसका गर्भपात हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि अगर भ्रूण जीवित अवस्था में पाया जाता है, तो अस्पताल भ्रूण के जीवित रहने को सुनिश्चित करने के लिए सभी सहायता करेगा। यदि भ्रूण जीवित रहता है तो राज्य सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगी कि बच्चे को कानून के अनुसार गोद लिया जाए।
बोर्ड से मांगी थी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 19 अगस्त को भी सुनवाई की थी। तब गुजरात हाईकोर्ट के रवैये पर चिंता जाहिर करते हुए उच्चतम अदालत ने कहा था कि मामले के लंबित होने के कारण कीमती समय बर्बाद हो गया। तब ही अदालत ने मेडिकल बोर्ड से ताजा रिपोर्ट मांगी थी।
कोर्ट ने बनाया था बोर्ड
बता दें कि दुष्कर्म पीड़िता 25 साल की है। उसने गर्भपात की मंजूरी के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई थी, जिस पर आनन-फानन में सुनवाई की गई। पीड़िता का दावा था कि चार अगस्त को गर्भ का पता चला। सात अगस्त को कोर्ट में अर्जी लगाई गई थी। कोर्ट ने बोर्ड बनाया था। 11 अगस्त को रिपोर्ट आई थी। बोर्ड हमारी दलील के समर्थन में था। लेकिन हाईकोर्ट ने सरकार की नीति के हवाले से अर्जी खारिज कर दी थी।
प्रेग्नेंसी अबॉर्शन का नियम क्या कहता है
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत, किसी भी शादीशुदा महिला, रेप विक्टिम, दिव्यांग महिला और नाबालिग लड़की को 24 हफ्ते तक की प्रेग्नेंसी अबॉर्ट करने की इजाजत दी जाती है। 24 हफ्ते से ज्यादा प्रेग्नेंसी होने पर मेडिकल बोर्ड की सलाह पर कोर्ट से अबॉर्शन की इजाजत लेनी पड़ती है। MTP एक्ट में बदलाव साल 2020 में किया गया था। उससे पहले 1971 में बना कानून लागू होता था।
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट एक बार फिर चर्चा में है। कारण सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला है। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने एक रेप पीड़ित को 28 सप्ताह के भ्रूण का गर्भपात करने की अनुमति दे दी है। यह अपने आपमें इस तरह का पहला मामला है। यह अधिनियम मेडिकल बोर्ड की मंजूरी से अधिकतम 24 हफ्ते तक के गर्भ को गिराने की अनुमति देता है। इस तरह यह मामला देश का पहला और अनूठा हुआ।
देश में पहली बार यह एक्ट 1971 में लागू हुआ था, इस एक्ट में प्रावधान था शादी-शुदा महिला गर्भपात करवा सकती थी। गर्भ का समय अधिकतम 20 सप्ताह तक हो सकता था। यद्यपि इसमें कुछ शर्तें थीं। अगर गर्भ 12 हफ्ते का है तो एक डॉक्टर की सहमति जरूरी थी। 20 हफ्ते कागर्भ होने की स्थिति में दो डॉक्टर की राय आवश्यक थी। साल 2021 में केंद्र सरकार ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट यानी MTP में संशोधन किया। इसके लागू होने के बाद कुछ शर्तों के साथ अविवाहित महिला को भी गर्भपात की अनुमति दी गयी।
ये हैं गर्भपात के नियम

20 हफ्ते तक का गर्भ होने पर एक डॉक्टर की सहमति, 20-24 हफ्ते के गर्भ पर दो डॉक्टर की सहमति जरूरी मानी गयी। एक नई व्यवस्था यह भी जोड़ी गयी जिसमें गर्भ अगर 24 हफ्ते से ज्यादा है तो मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट जरूरी और अदालत की अनुमति जरूरी होगी। इसमें रेप पीड़ित या भ्रूण के अबनॉर्मल होने की स्थिति में भी अनुमति देता है साल 2021 का एक्ट। दोनों ही एक्ट में पीड़ित महिला की पहचान का खुलासा करने पर दण्ड की व्यवस्था है। 1971 वाले एक्ट में एक हजार रुपये का फाइन था और अब फाइन के साथ ही एक साल की सजा भी हो सकती है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने दी थी अनुमति
इससे पहले साल 2021 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने 22 हफ्ते के एक ऐसे भ्रूण को गिराने की अनुमति दी थी, जो असामान्य रूप से विकृत था। ताजा मामला गुजरात से जुड़ा हुआ है। 25 साल की महिला के साथ जनवरी में रेप हुआ। वह प्रेग्नेंट हो गयी। जब महिला संभली तो अस्पतालों के चक्कर लगाना शुरू किया। बात नहीं बनी तो हाईकोर्ट पहुंची। गुजरात उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज कर दी।
दुष्कर्म के घावों को याद दिलाती है प्रेगनेंसी

बीते 19 अगस्त को महिला सुप्रीम कोर्ट पहुंची। 21 अगस्त को इसकी सुनवाई जस्टिस बी.वी. नागरत्ना तथा जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने सुनवाई करते हुए गर्भपात की न केवल अनुमति दी बल्कि जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि ऐसी प्रेग्नेंसी दुष्कर्म के घावों को याद दिलाती है। पीडिता की पीड़ा इससे बढ़ती है। मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। वह पहले से ही टूट चुकी होती है। सर्वोच्च अदालत ने इस मामले गुजरात हाईकोर्ट के फैसले पर भी टिप्पणी की। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इतने संवेदनशील मामले में आप 12 दिन बाद की तारीख कैसे दे सकते हैं, जब पीड़ित के लिए एक-एक दिन भारी पड़ रहा हो।
जानिए क्या है पूरा मामला
पीड़ित महिला के साथ जनवरी 2023 में रेप हुआ। जिसके बाद वह प्रेग्नेंट हो गई। महिला अबॉर्शन कराना चाहती थी। मगर समय निकलता गया और उसकी प्रेग्नेंसी 28 हफ्ते की हो गई। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत 24 हफ्ते से ज्यादा की प्रेग्नेंसी अबॉर्ट कराने के लिए कोर्ट से इजाजत लेनी पड़ती है।




