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Chandrayaan-3 Landing: कौन हैं बालोद के भानपुरी के मिथलेश साहू ? जिन्होंने चंद्रयान 3 में निभाई अहम भूमिका,

नई दिल्ली – भारत के लिए आज का दिन बेहद खास है। चंद्रयान-3 का लैंडर मॉड्यूल (एलएम) बुधवार शाम चंद्रमा की सतह पर उतरेगा। लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) से युक्त लैंडर मॉड्यूल शाम छह बजकर चार मिनट पर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र पर सॉफ्ट लैंडिंग कर सकता है।

ऐसा होने पर भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बन जाएगा। सिर्फ भारतवर्ष ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया इस ऐतिहासिक पल का टकटकी लगाए इंतजार कर रही है।

यह हर भारतीय के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन आपको उन हीरोज को जानना जरूरी है जो परदे के पीछे दिन-रात मेहनत करते हैं, तब जाकर हम ऐसे मिशनों को सफल होते देखते हैं। हम बात कर रहे हैं बालोद जिले के गुरुर ब्लॉक के ग्राम भानपुरी निवासी मिथलेश साहू की जोकि इसरो में आईटी सेक्टर में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए चंद्रयान-3 का मिशन का हिस्सा बने।

चंद्रयान 3 में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

चंद्रयान – तीन (Chandrayaan 3 Landing) के इस अभियान में छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के गुरुर ब्लाक अंतर्गत भानपुरी के मिथलेश साहू भी शामिल हैं। चांद पर चंद्रयान के सफल लैंडिंग के बाद मिथलेश के परिवार ने भी अपनी खुशी जाहिर की हैं। मिथलेश इसरो की टीम में बतौर वैज्ञानिक 2017 से शामिल है। इस सफलता के बाद मिथलेश के परिवारजनों के पास फोनकॉल के माध्यम से लगातार बधाई संदेश आ रहे हैं। पूरे मामले में इस अभियान से जुड़े मिथलेश के भाई लीलाधर साहू ने बताया कि इस पल को लेकर वो और उनका पूरा परिवार काफी उत्साहित है। क्योंकि इस मिशन के चलते कई बार मिथलेश और उनके परिवार के लोगों की आपस मे बातचीत भी नहीं हो पाती थी ।

पहले भी थी महत्वपूर्ण भूमिका

पिछली बार चंद्रयान-2 मिशन में भी इनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी रही और देश के प्रधानमंत्री ने भी इनसे मिलकर इनका उत्साहवर्धन किया था। इसरो के आईटी सेक्टर में काम करने वाले मिथलेश साहू के भाई लीलाधर साहू से जब बात की गई तो उन्होंने बताया कि भाई व्यस्त होने की वजह से कम बात कर पाता है।

जब अंतिम बात भाई की मिथलेश से बात हुई थी तो मिथलेश ने बताया था कि हमारा पूरा फोकस चंद्रयान-3 मिशन में है। हम सब पूरी टीम दिन रात जाग कर मेहनत कर रही है, इसके बाद मैं शायद परिवार को समय दे पाऊं।

मिथलेश में आगे बढ़ने की थी ललक

मिथलेश के बड़े भाई लीलाधर करहीभदर में कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र चलाते हैं। अपने छोटे भाई के बारे में उन्होंने बताया कि शुरू से ही मिथलेश में आगे बढ़ने की ललक थी। उन्होंने पहली से 12वीं तक की पढ़ाई रमतरा, भानपुरी और कन्नेवाड़ा के सरकारी स्कूल में की। वह त्योहारों पर घर नहीं आ पाते हैं। देश के लिए समर्पित हैं. इसरो ऐसी जगह है, जहां नित नए-नए प्रोजेक्ट बनते हैं और उसे गति दी जाती है।

2017 से इसरो में काम कर रहे हैं मिथलेश

मिथलेश अपने पिता शिक्षक ललित कुमार साहू को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। उनके पिता गांव भानपुरी के ही प्राथमिक स्कूल में प्रधान पाठक थे। मिथलेश के कंप्यूटर साइंस में इंजीनियर होने के कारण इसरो ने उन्हें आईटी डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी दी है। इस मिशन में भी वे कंप्यूटर वर्क के जरिए चंद्रयान-3 पर काम कर रहे हैं। मिथलेश की नवंबर 2016 में शादी हुई थी। इसके बाद उन्हें इसरो में इंटरव्यू के लिए कॉल आया। साल 2017 में मिथलेश ने इसरो में नौकरी शुरू की।

मां ने मिथलेश की खूबी बताई

मिथलेश की मां पार्वती बाई साहू ने बताया कि उनका बेटा पढ़ाई लिखाई में शुरू से अव्वल रहा है। कुछ अलग करने की सोच रखते हुए अपने स्कूली जीवन से ही वह वैज्ञानिक बनने की सोच रखता था। मिशन चंद्रयान 3 के सफल प्रक्षेपण के बाद उनके जीवन का एक सपना भी पूरा हुआ है।

पिता हैं प्रेरणा श्रोत-

मिथलेश 2017 से इसरो में काम कर रहे हैं। वह अपने पिता शिक्षक ललित कुमार साहू को प्रेरणास्रोत मानते हैं। जो गांव भानपुरी के ही प्राथमिक शाला में प्रधान पाठक थे। कंप्यूटर साइंस में इंजीनियर होने के कारण इसरो ने उन्हें आईटी डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी दी है। इस मिशन में भी वे कंप्यूटर वर्क के जरिए चंद्रयान-3 पर काम कर रहे हैं। 2016 नवंबर में शादी हुई, इसके बाद ही इसरो में इंटरव्यू के लिए कॉल आया। इसके बाद 2017 में इसरो ज्वाइन कर लिया।

बचपन का सपना आज पूरा हुआ –

मामले में मिथलेश की मां पार्वती बाई साहू ने बताया कि उनका पुत्र मिथलेश बचपन से ही होनहार था। पढ़ाई लिखाई में शुरू से अव्वल रहा और कुछ अलग करने की सोच रखते हुए अपने स्कूली जीवन से ही वैज्ञानिक बनने की सोच रखता था और आज इस मिशन चन्द्रयान 3 के सफल प्रक्षेपण के बाद उनके जीवन का एक सपना भी पूरा हुआ है।

मिथलेश कैसे बना वैज्ञानिक

मिथलेश अपनी पढ़ाई के बाद हैदराबाद में जब इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कार्य करते थे। इस दौरान मिथलेश की शादी हो गई। लेकिन इस बीच उसे इसरो में भर्ती के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने अपनी पत्नी मनस्मिता से कहा कि मुझे अब वैज्ञानिक बनने की दिशा में आगे बढ़ना है। इसके लिए मुझे कड़ी पढ़ाई करने की आवश्यकता रहेगी। इसके लिये हमें कुछ समय के लिए अलग रहना पड़ेगा। मिथलेश ने अपने शादी के महज तीन दिन के भीतर अपनी पत्नी को ये बातें असहजता से बोले कि आप कुछ दिनों के लिए अपने मायके चले जाए और मुझे इस वैज्ञानिक की पढ़ाई करने दीजिए। लेकिन ये बातें सहज यह स्वीकार करना आसान नहीं था। परंतु मिथलेश की पत्नी ने अपने पति के सपने को पूरा करने के लिए कठिन निर्णय लिया और मायके चली गई। दोनों की तपस्या सफल हुई और इस तरह मिथलेश अपने पढ़ाई को पूरा करते हुए वैज्ञानिक बन गया।

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