जगन्नाथ महाप्रसाद की अद्भुत कथा: कैसे माता पार्वती के वचन से सबको मिला दिव्य प्रसाद

पुरी, ओडिशा : भारतीय सनातन संस्कृति में भगवान जगन्नाथ का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। जगन्नाथ धाम न केवल चार धामों में एक है, बल्कि यहाँ का महाप्रसाद समस्त ब्रह्मांड के प्राणियों के लिए समान रूप से उपलब्ध होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं इस दिव्य महाप्रसाद के सार्वभौमिक वितरण के पीछे एक अद्भुत पौराणिक कथा छिपी है?

नारद जी ने मांग ही लिया वरदान
एक बार नारद मुनि ने बारह वर्षों तक माता लक्ष्मी की सेवा करने के बाद विनम्रता से वरदान माँगा कि वे भगवान विष्णु का महाप्रसाद प्राप्त करना चाहते हैं। माता लक्ष्मी धर्मसंकट में पड़ गईं क्योंकि भगवान विष्णु ने महाप्रसाद को गोपनीय रखने का निर्देश दे रखा था। फिर भी, उन्होंने नारदजी की इच्छा पूरी करने का वचन दिया।

सौ गुना बढ़ गया था अध्यात्म
कुछ समय बाद, भगवान विष्णु की अनुमति से माता लक्ष्मी ने नारद मुनि को महाप्रसाद प्रदान किया। उस प्रसाद के स्पर्श से नारद मुनि का तेज और अध्यात्म सौ गुना बढ़ गया। वे इसी दिव्य अनुभव को साझा करने कैलाश पहुँचे। जब भगवान शिव को नारद मुनि से यह ज्ञात हुआ तो वे भी महाप्रसाद पाने के लिए उत्सुक हो उठे।

भगवान शिव ने भी ग्रहण किया महाप्रसाद
जैसे ही शिवजी ने प्रसाद ग्रहण किया, वे श्रीकृष्ण प्रेम में इतना लीन हो गए कि नृत्य करने लगे। उनके इस उन्मत्त नृत्य से पृथ्वी डोलने लगी। माता पार्वती के प्रयासों से शिवजी शांत हुए। जब उन्हें प्रसाद न मिलने का कारण पता चला, तो उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि एक दिन यह दिव्य प्रसाद सबको उपलब्ध होगा।

विष्णु जी ने माता पार्वती को दिया वचन
ठीक उसी समय भगवान विष्णु प्रकट हुए और माता पार्वती को वचन दिया कि वे पुरुषोत्तम क्षेत्र, अर्थात् जगन्नाथ पुरी में प्रकट होंगे और समस्त सृष्टि को अपना महाप्रसाद देंगे। इसीलिए आज भी पुरी में भगवान जगन्नाथ को भोग लगाने के पश्चात सर्वप्रथम प्रसाद विमला देवी (माता पार्वती) को अर्पित किया जाता है।

पढ़िए प्रथा का विधान
यही कारण है कि कोई भी भक्त जगन्नाथ जी के विग्रह के समक्ष बैठकर प्रसाद ग्रहण नहीं करता, बल्कि इसे आदरपूर्वक कहीं और ग्रहण किया जाता है। इसलिए जब भी आप जगन्नाथ पुरी जाएँ, वहाँ का महाप्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि भगवान की करुणा और दिव्यता का प्रतीक है।



